मुआवजे के सही नियोजन की समझ देना भी जरूरी

भूमि अधिग्रहण – मुआवजे की दर दो गुणा या चार गुणा करने के साथ ही किसान को प्राप्त मुआवजे के सही नियोजन की समझ देना भी जरूरी*इन दिनों सड़क हेतु अधिग्रहीत की जाने वाली कृषि भूमियों के मुआवजे को प्रचलित गाइड लाइन दरों से दो गुणा के स्थान पर चार गुणा करने की बातचीत चल रही है ।मुझे वर्ष 1998 – 99 के दरम्यान का महेश्वर बांध से जुड़ा प्रसंग याद आ गया। उन दिनों डेम निर्माण को प्राइवेट सेक्टर के हवाले किया गया था और हम लोग एस कुमार्स ( विख्यात कपड़ा निर्माता कंपनी ) के बैनर तले बांध निर्माण और डूब की भूमि सीधे सीधे रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से किसानों से खरीद रहे थे। डूब प्रभावित पहले ही गाँव लेपा के एक किसान दशरथ की 10 एकड़ से थोड़ी ज्यादा ज़मीन बांध निर्माण की जद में थी । हम लोगों ने रु एक लाख पचास हजार रु प्रति एकड़ की दर से उनकी (थोड़ी असिंचित और थोड़ी बंजर जमीन) खरीदना तय किया जबकि उन दिनों सामान्य खरीद फरोख्त के प्रचलित रेट रु 40 हजार प्रति एकड़ से ज्यादा नहीं थे ।उस समय में दशरथ का कुल 16 लाख रु के आसपास मुआवजा बना जो उन्हें रजिस्ट्री के वक्त एक मुश्त चेक से दे दिया गया ।सामान्य जीवन जीने वाले भागीरथ की दुनिया पैसों से रातों रात बदल गई । अपने बारिश से टपकते झोपड़े में वे आनन फानन में कुलर , रंगीन टी व्ही, बड़ा रेफ्रिजरेटर और अनेक विलासिता की वस्तुएं ले आए । शराब के शौकीन हो गए। कुछ जुआरी मित्र बन गए जो रात दिन उन्हें जुए में मशगूल रखते थे । और तो और उन्होंने हीरो होंडा SS बाइक खरीदी । चलाना नहीं आती थी सो 1500/- रु माहवार का एक बाइक ड्राइवर रखा । चौबीस घंटे मुंह में पान दबाने की आदत बना ली और पान खरीदने मुद्दाम लेपा गांव से मंडलेश्वर नगर ड्राइवर संग बाइक पर आते थे ।डेढ़ दो साल तक दशरथ की ये नवाबी और उसकी दूर दूर तक चर्चा भी खूब चली । सोलह लाख रु फूंकने के बाद फिर महाशय को अपनी असल ज़मीन दिखाई दी । रुपया खत्म हुआ तो दोस्त गायब हो गए , खुद चुनी हुई मुफलिसी में कोई पुरसान हाल न बचा और उन्हें माजरा समझ आता उसके पहले ही पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी । थक हारकर हमारे सामने ही डेम की एक शाखा में रु साढ़े तीन हज़ार माहवारी के वेतन पर पेड़ लगाने हेतु गड्ढे खोदने का काम करने लगे हम सब स्टॉफ जनों ने उनका फर्श से अर्श और वापस अर्श से फर्श तक का सफर अपने सामने ही घटित होते देखा था ।कहने का आशय यह है कि पुश्तैनी ज़मीन चाहे बेचने पर या सरकार की किसी स्कीम में अधिग्रहीत हो जाने पर अचानक आए रुपयों के सैलाब को किसान सम्हाल नहीं पाते है । चंद महीनों या सालों में फिर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बन जाती है ।मुआवजे रुपया गाईड लाइन से दो गुणा या चार गुणा कर दो जब तक उसे हासिल करने वाले परिवारों को यथोचित और नियोजित इन्वेस्टमेंट की समझ तंत्र नहीं देगा तब तक मुआवजा हासिल करने वाले परिवारों का सही भला नहीं होगा ।मुफद्दल हुसैन…..✍️9754655030

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